जीवन सिर्फ बार-बार बनाने और तोड़ने का खेल नहीं है, एक समय ऐसा भी आता है जब हम चीज़ों को संजोकर रखना सीख जाते हैं।
खेतड़ी के उस छोटे से घर का आँगन बड़ा नहीं था, पर उसमें मानो दुनिया समाई हुई थी। सुबह की पहली किरण जैसे ही मिट्टी पर गिरती, आँगन चमक उठता, मानो किसी ने हल्दी से सूरज की किरणों को रंग दिया हो। वहीं कोने में तुलसी का चौरा था, जिसके पास बैठकर दादी हर रोज़ कुछ बुदबुदाती थीं। कोई समझ नहीं पाता कि वह प्रार्थना थी या बीते दिनों की कोई अधूरी बातें। आँगन के बीचों-बीच एक पुरानी चारपाई पड़ी रहती, जिसकी रस्सियाँ कई बार बदली जा चुकी थीं, पर उसकी चरमराहट वही पुराने किस्सों को बयां करा करती थी।
गुड्डी हर शाम वहीं खेलती, मिट्टी से घर बनाती, फिर खुद ही उसे तोड़ देती। उसकी माँ कई बार टोकती,
“इतनी मेहनत से बनाया, फिर क्यों तोड़ देती है?”
गुड्डी बस मुस्कुरा देती, “फिर से बनाने में मज़ा आता है, अम्मा।”
शायद वही आँगन की असली सीख थी, बनाना, बिगाड़ना, और फिर से बनाना।

दोपहर में जब सब अपने-अपने काम में लग जाते, आँगन जैसे थम सा जाता। हवा भी धीमी हो जाती, और पेड़ की छाया धीरे-धीरे आंगन के एक कोने से दूसरे कोने तक सरकती रहती। कभी-कभी कोई राहगीर दरवाज़े पर रुककर पानी माँग लेता, और आँगन अचानक फिर से जीवित हो उठता।
रात को, जब सब सो जाते, आँगन तारों की चादर ओढ़े चुपचाप आसमान को निहारता रहता। शायद वह भी सोचता होगा, कितनी कहानियाँ उसने अपने अंदर समेट रखी हैं।
एक दिन गुड्डी अपने सपनों को पंख देने के लिए शहर चली गई। माँ का काम जैसे अचानक बढ़ गया, बर्तन की खनखनाहट में अब पहले जैसी चंचलता नहीं रही, बस एक थकान-सी झलकती थी।
आँगन की चारपाई, जो कभी दादी और गुड्डी की हँसी-ठिठोली से गूंजती थी, अब ज़्यादातर खाली ही रहती थी।
घर वही था, आँगन वही, दीवारें भी वैसी ही थीं, पर हर चीज़ में एक अधूरापन था, एक ऐसा सन्नाटा, जो बोलता तो नहीं था, पर हर पल महसूस होता था।
सुबह की धूप अब भी आती थी, पर उसे देखने वाला कोई नहीं होता। तुलसी का पौधा सूखने लगा, पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। मिट्टी में अब भी वही महक थी, पर उसे महसूस करने वाले जैसे कहीं खो गए थे।
कई साल बाद, गुड्डी एक सफल आर्किटेक्ट बनकर गांव लौटी, अपने बचपन की यादों और अधूरे रिश्तों को फिर से जीने के लिए।
वह आँगन में खड़ी रही, कुछ देर तक, बिना कुछ बोले। उसने धीरे से मिट्टी को छुआ, जैसे किसी पुराने दोस्त को पहचानने की कोशिश कर रही हो।
चारपाई अब भी वहीं थी, पर उसकी रस्सियाँ ढीली हो चुकी थीं। तुलसी का चौरा खाली था। दीवारों पर समय के निशान थे।
गुड्डी ने आँखें बंद कीं।
उसे लगा जैसे दादी की बुदबुदाहट फिर से सुनाई दे रही है, माँ की आवाज़ रसोई से आ रही है, और छोटी सी गुड्डी मिट्टी से घर बना रही है।
उसने झुककर फिर से मिट्टी उठाई।
एक छोटा सा घर बनाया।
और कुछ देर तक उसे देखती रही।
फिर… उसने उसे नहीं तोड़ा।
आँगन चुप था।
शायद पहली बार, उसने भी इंतज़ार करना सीख लिया था, कि अब आगे क्या बनेगा… और क्या इस बार वो हमेशा के लिए रहेगा।
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सुंदर
For a few minutes, I felt like I was right there in Guddi’s story. It reminded me of my own time… the rising and setting sun in the village used to be so beautiful. It still is, but the charm that was there in childhood seems to be lost now.