मन्नू की टोपी

मन्नू की टोपी

मकान नं. 14/230 के बाहर आज कुछ ज़्यादा ही चहल-पहल थी। ऐसा लग रहा था जैसे मोहल्ले का वाई-फाई यहीं से फ्री में मिल रहा हो, हर कोई जुड़ा हुआ, हर कोई अपडेट ले रहा।

रामवती ने पल्लू संभालते हुए फिर पूछा, “तैयार है ना तू?”

मन्नू ने आईने में खुद को देखते हुए छाती फुला ली, “हाँ मौसी, आज तो इतिहास रचूँगा!”

इतिहास क्या था? दरअसल, ठीक एक साल पहले इसी दिन मन्नू ने बिना सोचे-समझे एक शर्त मान ली थी, “अगर अगले साल तक तू अपनी ‘लकी टोपी’ पहनकर पूरे मोहल्ले में घूम आया, और किसी ने तुझे पहचाना नहीं… तो 500 रुपये तेरे!”

अब सुनने में आसान लग रहा होगा… पर ट्विस्ट ये था कि मन्नू की “लकी टोपी” कोई साधारण टोपी नहीं थी।

वो टोपी ऐसी थी कि उसे पहनकर आदमी इंसान कम, चलता-फिरता मेला ज़्यादा लगता था। ऊपर से रंग-बिरंगे पंख, बीच में चमकता बल्ब (जो बैटरी से चलता था), और किनारे-किनारे झुनझुने, चलते ही “छन-छन-टन्न-टन्न”।

मौसी ने आखिरी बार टोपी सीधी करते हुए कहा, “बेटा, अगर कोई पहचान ले ना… तो सीधे घर भाग आना। इज़्ज़त बची रहेगी।”

मन्नू बोला, “मौसी, आज मन्नू नहीं… ‘मिस्टर एक्स’ निकलेगा!”

और फिर… धड़ाम! दरवाज़ा खुला… और मन्नू निकल पड़ा।

पहला मोड़, पप्पू पानवाले की दुकान।

पप्पू ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, फिर बोला, “अरे ओ भाई, नया सर्कस आया क्या शहर में?”

मन्नू ने आवाज़ बदलकर कहा, “नहीं-नहीं, मैं तो बस राहगीर हूँ…”

पप्पू: “अच्छा? राहगीर या ‘राह में गुमशुदा बैंड वाला’?”

मन्नू पसीना पोंछते आगे बढ़ गया।

दूसरा पड़ाव, शर्मा आंटी का घर।

आंटी ने दरवाज़ा खोला, मन्नू को देखा… और तुरंत अंदर जाकर अपने बेटे को बुलाया, “मुन्ना! जल्दी आ, तेरे स्कूल का प्रोजेक्ट खुद चलकर आ गया!”

मन्नू मन ही मन: हे भगवान, पहचानना मना है, मज़ाक उड़ाना नहीं!

तीसरा पड़ाव, गली का नुक्कड़।

यहाँ असली परीक्षा थी, क्योंकि पूरी ‘खुफिया एजेंसी’ यहीं बैठती थी, चार बुजुर्ग अंकल, जो बिना CCTV के भी सब देख लेते थे।

मन्नू धीरे-धीरे चला… टोपी छनक रही थी… बल्ब चमक रहा था…

पहला अंकल: “लगता है कोई एलियन आया है।”

दूसरा: “नहीं भाई, ये तो नया नेता लगता है, वादे ज़्यादा, काम कम।”

तीसरा: “अरे रुको… ये चाल कुछ जानी-पहचानी लग रही है…”

मन्नू का दिल धक-धक-धक!

चौथा अंकल अचानक बोले, “अरे नहीं यार, मन्नू होता तो इतनी अजीब टोपी कभी नहीं पहनता!”

मन्नू अंदर ही अंदर खुशी से उछल पड़ा, बच गया!

पूरा मोहल्ला घूमकर, इज्ज़त (थोड़ी-बहुत बची हुई) लेकर, मन्नू घर लौटा।

रामवती दरवाज़े पर ही खड़ी थी, “किसी ने पहचाना?”

मन्नू ने नाटकीय अंदाज़ में टोपी उतारी, बाल झटके और बोला, “मौसी… आज मन्नू ने कर दिखाया!”

तभी पीछे से पप्पू, शर्मा आंटी और चारों अंकल भी आ गए।

पप्पू हँसते हुए बोला, “अरे हम सबको पता था ये तू ही है…”

मन्नू का चेहरा उतर गया, “तो फिर किसी ने बोला क्यों नहीं?!”

शर्मा आंटी बोलीं, “अरे बेटा, 500 रुपये जीतने दे… इतना एंटरटेनमेंट फ्री में कहाँ मिलता है!”

चारों अंकल एक साथ बोले, “और वैसे भी… ऐसी टोपी पहनने की हिम्मत पूरे मोहल्ले में सिर्फ तेरे में ही है!”

मन्नू ने जेब में 500 रुपये रखे, टोपी को देखा… और बोला,
“ठीक है… अगली बार शर्त होगी, टोपी मौसी पहनेंगी!

रामवती: “हट बदमाश!” 😄

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