ज़रूरत इन लम्हों की

ज़रूरत इन लम्हों की

बरामदे में रखी पुरानी लकड़ी की कुर्सी हर शाम की तरह आज भी दादाजी का इंतज़ार कर रही थी। सूरज ढल रहा था, और आसमान के रंग धीरे-धीरे सुनहरे से नारंगी होते जा रहे थे। तभी आँगन में भागते हुए छोटे-छोटे कदमों की आहट गूंजी।

“दादाजी!” आरव ने जोर से पुकारा और उनके गले से लिपट गया। दादाजी मुस्कुराए, उनकी झुर्रियों में जैसे कई कहानियाँ छिपी थीं। “आ गए मेरे छोटे दोस्त? आज क्या सीखना है?” उन्होंने प्यार से पूछा।

“कहानी!” आरव ने तुरंत जवाब दिया, “वो वाली, जब आप छोटे थे।” दादी रसोई से ये सब देख रही थीं। उन्होंने धीरे से चाय का कप रखा और दोनों के पास आकर बैठ गईं। “हर रोज़ वही कहानी?” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। “दादी, हर बार वो नई लगती है,” आरव ने मासूमियत से कहा।

दादाजी ने गहरी सांस ली, जैसे यादों के पन्ने पलट रहे हों। “जब मैं तुम्हारी उम्र का था, तब ना मोबाइल था, ना टीवी। बस हम, हमारे दोस्त, और ये खुला आसमान”

आरव की आँखें चमक उठीं। “फिर आप क्या करते थे?”

“हम पेड़ों पर चढ़ते, नदी में कूदते, और रात को तारों के नीचे लेटकर सपने देखते,” दादाजी ने कहा। दादी ने बीच में जोड़ा, “और ये बहुत शरारती भी थे। एक बार आम चुराते हुए पकड़े गए थे।”

आरव हँस पड़ा, “दादाजी चोर थे!”

“अरे नहीं, बस थोड़ी सी शरारत थी,” दादाजी ने आँख मारते हुए कहा।

हँसी के उन लम्हों में समय जैसे ठहर गया था। हवा में पुरानी यादों की खुशबू घुल गई थी। रात गहराने लगी। आसमान में तारे चमकने लगे।
दादी ने आरव को अपनी गोद में लिया और कहा, “बेटा, ये जो पल हैं ना यही सबसे कीमती होते हैं। बड़े होकर तुम इन्हें बहुत याद करोगे।”

आरव ने मासूमियत से पूछा, “तो हम इन्हें संभालकर कैसे रखें?” दादाजी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “दिल में और अपनों के साथ बिताकर। क्योंकि ‘ज़रूरत इन लम्हों की’ तभी समझ आती है, जब ये बीत जाते हैं।”

आरव ने दोनों को कसकर गले लगा लिया। उस छोटे से आँगन में तीन पीढ़ियाँ बैठी थीं,

एक यादों में,
एक वर्तमान में,
और एक भविष्य में।

और उन तीनों के बीच जो बंधन था, वो था,
लम्हों की वो ज़रूरत, जो जिंदगी को खूबसूरत बनाती है।

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