कहानी पगडंडी की

कहानी पगडंडी की

गाँव में पहले कच्ची पगडंडी थी। बरसात में वह कीचड़ बन जाती, गर्मियों में धूल उड़ाती, और सर्दियों में ठंडी, सख़्त रेखा की तरह खेतों के बीच से गुजरती रहती। उसी रास्ते से लोग बाज़ार जाते, बच्चे स्कूल जाते, और शाम को लौटते वक्त धीरे-धीरे बातें करते हुए घर आते।

फिर एक दिन खबर आई, गाँव में डामर की सड़क बनेगी।

शुरू में किसी को यक़ीन नहीं हुआ। लेकिन कुछ ही हफ्तों में मशीनें आईं, गड्ढे खोदे गए, पत्थर बिछे, और काली, चमकती हुई सड़क धीरे-धीरे पगडंडी की जगह लेने लगी।

रामलाल रोज़ सुबह अपनी चौखट पर बैठकर यह सब देखता था। उसने अपनी ज़िंदगी का ज़्यादातर समय उसी पगडंडी के साथ गुज़ारा था। उसे याद था कैसे उसके पिता बैलगाड़ी लेकर उसी रास्ते से अनाज लाते थे, और कैसे वह खुद बचपन में नंगे पैर दौड़ता हुआ स्कूल जाता था।

अब वही जगह बदल रही थी।

“अच्छा है,” उसके बेटे मोहन ने कहा, “अब शहर जल्दी पहुंचेंगे, बारिश में दिक्कत नहीं होगी।”

रामलाल ने सिर हिलाया, “हाँ, अच्छा तो है…”

सड़क बनकर तैयार हुई तो पूरे गाँव में जैसे एक उत्सव सा माहौल था। पहली बार कोई बस गाँव के अंदर तक आई। बच्चे उसके पीछे-पीछे दौड़े, जैसे कोई नया खेल मिल गया हो।

धीरे-धीरे सब कुछ बदलने लगा।

अब लोग पहले से ज़्यादा जल्दी-जल्दी आने-जाने लगे। बाज़ार पास लगने लगा, और शहर की बातें गाँव में ज़्यादा सुनाई देने लगीं। कुछ नए लोग भी आने लगे—जमीन देखने, दुकान खोलने, या बस यूँ ही घूमने।

रामलाल अब भी सुबह वहीं बैठता था, लेकिन अब उसके सामने पगडंडी नहीं, एक सीधी, काली सड़क थी। उस पर गाड़ियों की आवाज़ गूंजती रहती।

एक दिन उसने देखा, उसका पोता सोनू उसी सड़क पर साइकिल चला रहा था—तेज़, बहुत तेज़। वह खुश था, हँस रहा था।

रामलाल मुस्कुराया, पर उसकी आँखें कुछ खोज रही थीं। “दादा, अब तो मज़ा आ गया ना?” सोनू ने रुककर पूछा। रामलाल ने कहा, “मज़ा तो है… पर पहले रास्ता लंबा लगता था, अब समय छोटा हो गया है।” सोनू कुछ समझा नहीं, वह फिर साइकिल लेकर निकल गया।

शाम को रामलाल धीरे-धीरे उसी सड़क पर चलने लगा। उसने महसूस किया कि अब रास्ते में रुकने की जगह कम हो गई है। पहले लोग चलते-चलते बात कर लेते थे, अब सब जल्दी में होते हैं।

वह उस जगह रुका, जहाँ पहले एक बड़ा नीम का पेड़ था। सड़क बनाने के लिए उसे काट दिया गया था। कुछ देर तक वह वहीं खड़ा रहा।

अगले दिन उसने देखा कि सड़क के किनारे एक छोटी सी पगडंडी फिर से बन रही है—लोगों के पैरों से, धीरे-धीरे। शायद कुछ लोग अब भी उसी पुराने रास्ते को याद करते थे, या शायद उन्हें जल्दी नहीं थी।

रामलाल ने उस पगडंडी की ओर देखा, फिर सड़क की ओर। सड़क सीधी थी, तेज़ थी, और दूर तक जाती थी। पगडंडी टेढ़ी थी, धीमी थी, और बस थोड़ी दूर तक ही दिखती थी।

वह कुछ पल सोचता रहा।

फिर उसने कदम बढ़ाया—लेकिन किस तरफ, यह किसी ने नहीं देखा।

गाँव में अब दोनों रास्ते थे।

एक डामर की सड़क, और एक धीरे-धीरे बनती हुई पगडंडी।

और शायद सवाल अब भी वही था—
रास्ता चुनना ज़रूरी है, या बस चलते रहना?

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This Post Has 3 Comments

  1. Malvika Singh

    Wow! It’s so beautiful. धीरे चलना तो जैसे हम सब भूल ही चुके हैं।