कृपया प्रतीक्षा करें, आप कतार में हैं…..
लाउडस्पीकर की यह ठंडी, मशीन जैसी आवाज़ राघव के कानों में पिछले पैंतालीस मिनट से गूंज रही थी। वह बैंक की लाइन में खड़ा था, हाथ में फॉर्म, जेब में अधूरी उम्मीदें और दिमाग में पूरी जिंदगी का हिसाब-किताब।
उसने आगे खड़े आदमी को देखा, जो हर पाँच मिनट में अपनी घड़ी देखता और फिर काउंटर की तरफ ऐसे घूरता जैसे उसकी नजरों से ही काम जल्दी हो जाएगा। पीछे खड़ी औरत फोन पर किसी को समझा रही थी कि “बस दो मिनट में हो जाएगा”, राघव मुस्कुरा दिया। उसे लगा, “दो मिनट” इस देश का सबसे लंबा मापदंड है।
लाइन धीरे-धीरे सरकती रही, जैसे जिंदगी सरकती है, बिना पूछे, बिना रुके। राघव को अचानक याद आया, कैसे वह बचपन में स्कूल की असेंबली में लाइन में खड़ा होता था, फिर कॉलेज में एडमिशन की लाइन, फिर नौकरी के इंटरव्यू की लाइन, और अब यह बैंक। हर जगह वही आवाज़, वही इंतजार, बस कतारें बदलती रहीं।
“अगला!” काउंटर से आवाज़ आई।
राघव एक कदम आगे बढ़ा। उसे लगा जैसे उसने कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली हो। लेकिन तभी काउंटर बंद हो गया, लंच टाइम।
भीड़ में एक सामूहिक आह निकली। किसी ने गुस्से में कहा, “यार, ये सिस्टम कभी नहीं सुधरेगा।” राघव ने सोचा, सिस्टम तो शायद सुधर भी जाए, पर इंसान की आदतें? शायद नहीं।
उसने जेब से फोन निकाला। सोशल मीडिया पर लोग अपनी “परफेक्ट लाइफ” की तस्वीरें डाल रहे थे, कहीं समुद्र किनारे, कहीं कैफे में, कहीं मुस्कुराते हुए। राघव को हंसी आई। उसने सोचा, “शायद वे भी किसी न किसी कतार में ही खड़े हैं, बस फोटो में नहीं दिखती।”
धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि कतार सिर्फ बैंक की नहीं है। यह कतार है, सपनों की, अवसरों की, मान्यता की। हर कोई आगे बढ़ना चाहता है, लेकिन जगह सीमित है और इंतजार अनंत।
“भाई साहब, आप आगे बढ़िए,” पीछे से किसी ने कहा।
राघव चौंका। लाइन फिर से चल पड़ी थी। उसने एक और कदम बढ़ाया। उसे लगा, शायद जिंदगी का मतलब यही है, कदम बढ़ाते रहना, चाहे कितनी भी बार रुकना पड़े।
काउंटर अब बस कुछ ही दूर था। लेकिन तभी लाउडस्पीकर फिर गूंजा,
कृपया प्रतीक्षा करें, आप कतार में हैं…….

Ek aam se pal ko is kahani mein piro ke bahut khaas bana diya aap dono ne.