ज़रूरत इन लम्हों की

बरामदे में रखी पुरानी लकड़ी की कुर्सी हर शाम की तरह आज भी दादाजी का इंतज़ार कर रही थी। सूरज ढल रहा था, और आसमान के रंग धीरे-धीरे सुनहरे से…

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