समुद्र के किनारे एक दिन…

समुद्र के किनारे एक दिन…

पुरी के समुद्र तट पर उस शाम हवा में नमक की एक हल्की सी खुशबू घुली हुई थी। आसमान धीरे-धीरे अपने रंग बदल रहा था नीले से सुनहरे, और फिर हल्के नारंगी में ढलता हुआ। दूर कहीं मछुआरों की नावें वापस लौट रही थीं, और उनके पीछे-पीछे उड़ते पक्षियों की आवाज़ें हवा में घुल रही थीं। रेत दिन भर की धूप के बाद अब ठंडी होने लगी थी, और उस पर चलते लोगों के पैरों के निशान एक-दूसरे में मिलते जा रहे थे, जैसे कई कहानियाँ एक साथ बह रही हों।

उसी रेत पर, थोड़ी दूर भीड़ से अलग शोभा चुपचाप बैठी थी। उसकी साड़ी का किनारा हवा के साथ हल्का-हल्का लहरा रहा था, और बालों की कुछ लटें बार-बार उसके चेहरे पर आकर ठहर जाती थीं।

उसकी नजरें सामने फैले अथाह समुद्र पर टिकी थीं। लहरें एक लय में उठतीं, आगे बढ़तीं और फिर किनारे से टकराकर लौट जातीं, हर बार कुछ कहती हुई, हर बार कुछ छोड़ती हुई। वह लंबे समय से वहीं बैठी थी, बिना हिले, बिना कुछ बोले, जैसे उसके भीतर भी कोई समुद्र चल रहा हो यादों का, एहसासों का।

उसने धीरे से गहरी साँस ली, “यही तो जगह है” उसने मन ही मन कहा।

कई साल पहले, इसी किनारे पर वह पहली बार आई थी, अपने पति अशोक और छोटे-छोटे बच्चों के साथ। बच्चे रेत में घर बनाते थे, और वह हँसते हुए उन्हें बार-बार गिरते हुए देखती थी। अशोक लहरों से डरने का नाटक करता, और बच्चे खिलखिलाकर उसकी ओर भागते। वह पल जैसे आज भी हवा में तैर रहा था।

एक तेज लहर आई और उसके पैरों को छूकर लौट गई। वह हल्का सा मुस्कुराई, “तुम अब भी वैसे ही हो, हमेशा मेरा हाथ थामे हुए, बिन कहे सब कुछ समझने वाले।”

लहरों की आवाज़ अब उसे शोर नहीं लग रही थी। वह जैसे हर लहर में एक आवाज़ सुन पा रही थी, बच्चों की हँसी, पति की धीमी बातें, और अपने ही दिल की धड़कनें। उसने धीरे से रेत उठाई और अपनी मुट्ठी में भर ली। फिर धीरे-धीरे उसे गिरने दिया। “सब कुछ ऐसे ही तो फिसल गया” उसने सोचा, “पर कुछ भी खोया नहीं, सब यहीं कहीं है।”

सामने समुद्र फैला था, अंतहीन, गहरा, और शांत। जैसे उसकी अपनी ज़िंदगी। उसमें खुशियाँ भी थीं, दर्द भी, और अनगिनत अनकहे पल भी।

एक और लहर आई, इस बार थोड़ी बड़ी। उसने उसके पैरों को भिगो दिया। वह ज़रा भी पीछे नहीं हटी। “ले जाओ” उसने धीरे से कहा, “जो भी बचा है, उसे भी अपने साथ बहा लो या शायद, वापस वही दे दो जो कभी मेरा था।” पर समुद्र ने कुछ नहीं कहा। वह बस अपनी लहरों में सब कुछ समेटे रहा था, जैसे हमेशा से करता आया था।

धीरे-धीरे अंधेरा बढ़ने लगा। आसमान में पहला तारा दिखाई दिया। वह उठी, अपनी साड़ी ठीक की, और एक बार फिर समुद्र की ओर देखा। उसकी आँखों में अब नमी थी, पर एक सुकून भी। जैसे उसने अपनी पूरी ज़िंदगी को एक बार फिर जी लिया हो, इन लहरों के साथ, इस अनंत सागर के साथ।

और फिर वह धीरे-धीरे चल दी, पर उसकी यादें, उसकी हँसी, और उसके अपने, सब वहीं रह गए, उस पुरी के किनारे, उन लहरों में हमेशा के लिए।

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This Post Has 4 Comments

  1. Lisa

    I found that beautiful, and so, so sad. The sea waves, and the waves, the sea, of her memories. I don’t know her back story, but feel the loss.

  2. नीरजा भटनागर

    पुरी का वह समुद्र शोभा की यादों का साथी बन गया — शांत, गहरा और सब कुछ अपने भीतर समेटे हुए।
    “सब कुछ फिसल गया… पर कुछ भी खोया नहीं” — यही पंक्ति पूरी कहानी की आत्मा है। बहुत सुंदर और मन को छू लेने वाला लेखन।

    1. MeenalSonal

      जान कर ख़ुशी हुई की आपको हमारी कहानी अच्छी लगी, धन्यवाद!