जीवन में नकारात्मक भावनाओं (डर, दुख, पछतावा) को छोड़ देना चाहिए, लेकिन सपनों और उम्मीदों को हमेशा संभालकर रखना चाहिए, क्योंकि वही हमें आगे बढ़ने की ताकत देते हैं।
गाँव के पुराने स्कूल की पीली पड़ी दीवारों के पास अक्सर कागज़ के छोटे-छोटे टुकड़े उड़ते रहते थे। गर्मियों की दोपहर में जब लू चलती, तो ये फ़र्रे धूल के साथ आसमान में ऐसे नाचते जैसे किसी ने अपने सारे राज़ खोलकर हवा के हवाले कर दिए हों। बच्चे उन्हें “फ़र्रे” कहते थे, वही फ़र्रे जो कुछ शरारती बच्चे परीक्षा में नकल के लिए छुपाकर लाते थे, कभी जूतों में, कभी कमीज़ की मोड़ी हुई बाँहों में।
राघव भी उसी स्कूल का छात्र था, लेकिन उसकी जेब में रखे फ़र्रे अलग थे। वह पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर बहुत देर तक कुछ लिखता रहता, फिर उन कागज़ों को छोटे-छोटे टुकड़ों में मोड़कर हवा में उड़ा देता। उसके चेहरे पर न मुस्कान होती, न कोई शरारत, बस एक अजीब-सी खामोशी।
घर की हालत भी कुछ वैसी ही थी। मिट्टी का छोटा-सा आँगन, एक कोने में चूल्हा, और दीवार पर टंगी उसके पिता की धुंधली तस्वीर। पिता शहर कमाने गए थे, पर सालों से लौटकर नहीं आए। माँ सुबह से शाम तक खेतों और घर के काम में जुटी रहतीं, और रात को थककर चुपचाप सो जाती। घर में बातें कम, सन्नाटा ज़्यादा रहता था।
एक दिन गणित की परीक्षा थी। बच्चे इधर-उधर से फ़र्रे निकालकर झाँक रहे थे। मास्टरजी की नज़र अचानक राघव पर पड़ी, जो कुछ लिखकर अपनी मुट्ठी में छुपा रहा था।
“राघव! इधर आओ,” उनकी आवाज़ सख़्त थी।
पूरी कक्षा शांत हो गई। सबको लगा आज राघव भी पकड़ा गया।
“क्या है तुम्हारे हाथ में?” मास्टरजी ने पूछा।
राघव ने बिना कुछ कहे धीरे से अपनी मुट्ठी खोली और कागज़ उन्हें दे दिया।
उस पर लिखा था, “माँ को कभी आराम करते नहीं देखा… अच्छा नहीं लगता।”
मास्टरजी ठिठक गए।
उन्होंने उसकी जेब टटोली, और भी फ़र्रे निकले। हर एक पर कुछ लिखा था,
“मुझे अँधेरे से डर लगता है।”
“काश पापा एक बार लौट आते।”
“मैं सबकी तरह हँसना चाहता हूँ।”
कक्षा में सन्नाटा और गहरा हो गया। जो बच्चे अभी तक नकल कर रहे थे, उन्होंने धीरे-धीरे अपने फ़र्रे छुपा लिए।
“तुम इन्हें उड़ाते क्यों हो?” मास्टरजी ने इस बार नरम आवाज़ में पूछा।
राघव ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा, “क्योंकि जब ये पास रहते हैं… तो बहुत भारी लगते हैं। उड़ जाते हैं, तो हल्का लगता है।”
उस दिन परीक्षा बीच में ही रुक गई।
मास्टरजी ने ब्लैकबोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखा, “आज का पाठ: फ़र्रे ज़िंदगी के…”
उन्होंने सब बच्चों से कहा, “आज हर कोई अपने दिल की बात लिखेगा, वो जो किसी से कह नहीं पाते।”
धीरे-धीरे हर बच्चा लिखने लगा। किसी ने अपने डर लिखे, किसी ने अपनी गलतियाँ, किसी ने अपने छोटे-छोटे दुख। हवा हल्की चल रही थी, जैसे वो भी इन बातों को सुनने को तैयार हो।
फिर सब बच्चे मैदान में गए। “अब इन्हें उड़ाओ,” मास्टरजी ने कहा।
सैकड़ों फ़र्रे एक साथ आसमान में उड़े, किसी का ग़ुस्सा, किसी का डर, किसी की कमी… सब हवा में घुलते चले गए।
राघव ने भी अपने सारे फ़र्रे निकालकर उड़ा दिए। उसकी आँखों में हल्की नमी थी, लेकिन इस बार वो मुस्कुरा रहा था।
मास्टरजी उसके पास आए और बोले, “देखो राघव, परीक्षा में जो फ़र्रे होते हैं, वो हमें धोखा देते हैं… लेकिन ज़िंदगी के फ़र्रे हमें सिखाते हैं कि क्या छोड़ना है।”
राघव ने धीरे से पूछा, “क्या हर बार छोड़ देना चाहिए?”
मास्टरजी मुस्कुराए, “दुख, डर, पछतावा, हाँ। लेकिन सपने और उम्मीद… उन्हें पकड़कर रखना।”
राघव ने अपनी कॉपी से एक आखिरी कागज़ फाड़ा। इस बार उसने बड़े अक्षरों में लिखा, “मैं खुश रहूँगा… और माँ को भी हँसाऊँगा।”
उसने उसे हवा में नहीं उछाला, अपनी जेब में सम्भाल कर रख लिया।
उस दिन के बाद स्कूल की दीवारों के पास उड़ते फ़र्रे वही थे, लेकिन उनका मतलब बदल गया था। अब वो नकल के नहीं, हल्के दिल के फ़र्रे थे।
और राघव समझ चुका था, ज़िंदगी को पूरी तरह जीना है, तो फ़र्रे उड़ाने पड़ते हैं…जो रोकते हैं उन्हें छोड़ना पड़ता है, और जो जीने देते हैं उन्हें संभालकर रखना पड़ता है।

a very inspiring story!