जब ओले गिरे जून में

जब ओले गिरे जून में

वैसे तो राहुल को गर्मी का मौसम बड़ा अच्छा लगता था, क्योंकि ठंडी-ठंडी आइसक्रीम खाने को मिल जाती थी। पर उसका बाहर जाकर खेलना भी तो कम हो जाता था, क्योंकि मम्मी पूरा दिन यही कहती रहती थीं, “लू लग जाएगी।”

अब गर्मियों की छुट्टियों में पूरा दिन घर पर भी तो नहीं बैठा जा सकता।

एक दिन झुंझलाकर उसने आसमान की तरफ देखा और कह दिया, “भगवान, ओले बरसा दो, थोड़ी ठंडक करवा दो”

इतना कहकर वह बिस्तर पर गिरा और कब नींद आ गई, उसे पता ही नहीं चला।

कुछ देर बाद मम्मी की आवाज़ आई, “उठ जा बेटा, देख, ओले गिर रहे हैं!”

राहुल की आँखें चमक उठीं। वह भागकर बाहर गया, आँगन में सचमुच सफेद-सफेद ओले बिखरे पड़े थे। छत से टप-टप गिरते हुए, ज़मीन से टकराकर उछलते हुए। ठंडी हवा चल रही थी।

“सच में!” राहुल खुशी से चिल्लाया और दोनों हाथ फैलाकर ओले पकड़ने लगा। वह उन्हें इकट्ठा कर-करके बाल्टी में भरने लगा। फिर एक ओला उठाकर मुँह में डाल लिया, बर्फ जैसा ठंडा!

तभी अचानक हवा तेज़ हो गई। ओले बड़े होने लगे, अब वे ज़ोर से गिरने लगे थे। “मम्मी!” राहुल थोड़ा घबरा गया। पेड़ों की डालियाँ झुकने लगीं, छत पर ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ आने लगी। मम्मी ने दरवाज़े से आवाज़ लगाई, “अंदर आ जाओ राहुल!”

राहुल दौड़कर अंदर आया। दिल तेज़ी से धड़क रहा था। उसने खिड़की से बाहर देखा, जो ओले अभी तक उसे अच्छे लग रहे थे, वही अब डराने लगे थे।

तभी,

“राहुल, उठो, फोन आया है,” मम्मी की आवाज़ फिर सुनाई दी, “स्विमिंग जाने के लिए बुला रहे हैं।”

राहुल ने चौंककर आँखें खोलीं। न आँगन में ओले थे, न तूफान, सब सपना था। वह कुछ देर तक चुप बैठा रहा। फिर धीरे से बोला, “अच्छा हुआ सपना था।”

मम्मी ने पूछा, “क्या हुआ?”

राहुल ने मुस्कुराकर कहा, “कुछ नहीं, बस सोचा था ओले गिरें पर जब ज़्यादा गिरने लगे, तो डर लगने लगा।”

मम्मी ने उसके सिर पर हाथ फेरा, “हर चीज़ जितनी चाहिए, उतनी ही अच्छी लगती है।” राहुल ने सिर हिलाया, बैग उठाया और स्विमिंग के लिए निकल गया। शाम को लौटते वक्त उसने आसमान की तरफ देखा धूप अब भी थी, पर उसे उतनी बुरी नहीं लग रही थी।

उसने मन ही मन कहा,
“भगवान ओले मत गिराना, बस इतना करना कि जो मिले, वो सही लगे।”

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