किसी भी वस्तु की असली कीमत उसके नएपन, चमक या महंगे होने में नहीं, बल्कि उस प्यार, अपनापन और भावनाओं में होती है जो हम उससे जोड़ते हैं। कृतज्ञता और संतोष हमें छोटी-छोटी चीज़ों में भी बड़ी खुशियाँ देना सिखाते हैं।
आज फिर बीनू की दुकान की बहुत चर्चा हो रही थी, वैसे तो हर बच्चे की वह पसंदीदा दुकान हुआ करती है, खिलौने की दुकान जो ठहरी। मुझे यहीं रोबोट चाहिए पिताजी, राजू हमेशा की तरह ज़िद करने लगा।
एक छोटा सा लाल-पीले रंग का बैटरी से चलने वाला रोबोट, जिसकी आँखों में नीली एलईडी लाइटें चमकती थीं, छाती पर चाँदी जैसा गोल बटन लगा था, और जब उसे चलाया जाता था तो वह धीमे-धीमे आगे बढ़ते हुए टिक-टिक की आवाज़ करता था, जैसे वह अपने छोटे-छोटे कदमों से दुनिया को नाप रहा हो। उस रोबोट की सतह चिकनी थी, उसके हाथ हल्के-हल्के हिलते थे, और उसके सिर पर लगा पारदर्शी प्लास्टिक का कवर उसे किसी भविष्य की दुनिया से आया हुआ खास खिलौना बना देता था।
जब वह पहली बार दुकान की ऊँची शेल्फ से उतारा गया, तो जैसे उसकी पूरी दुनिया ही बदल गई, क्योंकि अब वह सिर्फ एक सामान नहीं रह गया था, बल्कि किसी के जीवन की खुशी बनने वाला था। उसे बड़े ही सलीके और प्यार से पैक किया गया, सुंदर रिबन से सजाया गया, और फिर एक बड़े, सुसज्जित घर में लाया गया, जहाँ हर चीज़ में सुविधा और सम्पन्नता साफ झलकती थी।
राजू के पास पहले से ही कई तरह के खिलौने थे, लेकिन इस नए रोबोट में जैसे उसे कोई नया दोस्त मिल गया हो।
राजू के लिए वह रोबोट सिर्फ एक खिलौना नहीं था, बल्कि उसकी दुनिया का सबसे खास हिस्सा बन गया था, क्योंकि वह सुबह उठते ही सबसे पहले उसी को चालू करता, उसके पीछे-पीछे घर में घूमता, और उसकी हर छोटी हरकत पर खुश होता।
वह रोबोट जब टिक-टिक करता हुआ चलता, तो राजू खिलखिलाकर हँसता, और कई बार उससे बात भी करता, जैसे वह सच में उसे समझ सकता हो।
कुछ दिनों तक घर में उसी रोबोट की बातें होती रहीं, और हर कोई यह देखकर खुश होता रहा कि राजू को उससे कितनी खुशी मिल रही है, जैसे वह रोबोट उसके बचपन का सबसे प्यारा हिस्सा बन गया हो।
खिलौना भी जैसे इस प्यार और ध्यान को महसूस कर रहा था, और उसे लगने लगा था कि वह वास्तव में बहुत खास है, शायद सबसे खास।
लेकिन धीरे-धीरे समय बीतने लगा, और जैसे-जैसे दिन आगे बढ़े, राजू का ध्यान भी बदलने लगा, क्योंकि अब उसके पास और नए खिलौने आ गए थे, जो उससे भी ज़्यादा चमकीले, ज़्यादा आधुनिक और ज़्यादा रोमांचक लग रहे थे।
अब वही रोबोट, जो कभी उसके हाथों से अलग नहीं होता था, कमरे के एक कोने में चुपचाप पड़ा रहने लगा, उसकी नीली आँखों की रोशनी कभी-कभी ही जलती थी, जैसे वह भी इंतज़ार कर रहा हो कि कोई फिर से उसे देखे।
उसके रंग अभी भी वैसे ही थे, उसकी चाल भी वैसी ही थी, लेकिन अब उसकी “कीमत” बदल चुकी थी, कम से कम उस घर की नज़रों में।
एक दिन जब घर की सफाई हो रही थी, तो राजू की माँ ने उस रोबोट को उठाया, “अब यह काम का नहीं रहा, इसलिए इसे अलग रख देना चाहिए।”
कुछ समय बाद, वह एक पुराने डिब्बे में बंद कर दिया गया और उस घर से बाहर कर दिया गया, जहाँ कभी वह सबसे ज़्यादा प्रिय था।
अब वह एक बिल्कुल अलग जगह पर था, एक छोटी सी बस्ती, जहाँ न तो बड़े घर थे और न ही बहुत सारे साधन, लेकिन वहाँ रहने वाले लोगों की आँखों में सच्ची भावनाएँ और छोटे-छोटे सपने जरूर थे।
उसी बस्ती में रानी नाम की एक छोटी बच्ची रहती थी, जिसके पास खेलने के लिए बहुत कम चीज़ें थीं, लेकिन उसके मन में खुश होने की एक अलग ही क्षमता थी।
जब उस रोबोट को पहली बार उसके हाथों में दिया गया, तो उसकी आँखें अचानक से चमक उठीं, जैसे उसे कोई अनमोल खज़ाना मिल गया हो, और वह यकीन ही नहीं कर पा रही थी कि इतना सुंदर खिलौना अब उसका हो सकता है।
उसने बहुत धीरे से उस रोबोट को दबाया, और जैसे ही उसकी नीली आँखें चमकीं और वह टिक-टिक करता हुआ आगे बढ़ा, रानी की हँसी पूरे आँगन में गूंज उठी।
उसने हिचकिचाते हुए पूछा कि क्या यह सच में उसका है, और जब उसे यह जवाब मिला कि हाँ, अब यह तुम्हारा ही है, तो उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा।
रानी ने उस रोबोट को बहुत ही प्यार से साफ किया, उसकी धूल हटाई, और उसे अपने पास रख लिया, जैसे वह कोई अनमोल चीज़ हो जिसे वह कभी खोना नहीं चाहती।
उसके लिए वह रोबोट सिर्फ खेलने की चीज़ नहीं था, बल्कि उसकी खुशी, उसका साथी और उसकी छोटी-सी दुनिया का सबसे कीमती हिस्सा बन गया था।
रात को वह भी उसे अपने पास सुलाती थी, उसकी बंद पड़ी आँखों को देखते हुए मुस्कुराती थी, जैसे वह जानती हो कि यह सिर्फ एक खिलौना नहीं, बल्कि उसकी अपनी कहानी का हिस्सा है।
अब वह रोबोट फिर से खास बन गया था, लेकिन इस बार उसकी चमक उसके रंगों या नएपन में नहीं थी, बल्कि उस नजर में थी, जिससे उसे देखा जा रहा था।
दिन बीतते गए, लेकिन रानी के लिए वह रोबोट कभी पुराना नहीं हुआ, क्योंकि उसके लिए चीज़ों की कीमत उनके नए या पुराने होने से नहीं, बल्कि उनके होने से तय होती थी।
और कहीं दूर, उसी बड़े घर में, नए खिलौनों का ढेर लगातार बढ़ता जा रहा था।
