पिता — एक ऐसा शब्द जिसमें पूरे जीवन की मजबूत नींव समाई होती है। उनके साये में हम ना जाने कब बड़े हो जाते हैं, लेकिन उनके छोटे-छोटे संकेत, उनकी आदतें, और उनकी निशानियाँ जीवन भर हमारे साथ रहती हैं। ऐसी ही एक निशानी है — बाबा का गमछा।
आज, फादर्स डे पर, उन्हीं अनकहे जज़्बातों और स्मृतियों को समर्पित ये पंक्तियाँ…
बचपन की धूप में, छाँव बन के आया,
बाबा का गमछा, मेरे सिर पे छाया।
न धूप जली, न बारिश ने भिगोया,
उस गमछे ने हर तूफ़ान से रोका।
मैले से कपड़े, पर पवित्र थी छुअन,
उसमें लिपटा था बाबा का अपनापन।
कभी काँधे पे डाला, कभी हवा में लहराया,
जब डर लगा, उसी में चेहरा छुपाया।
रोटी के साथ मेहनत परोसी,
थके हाथों से हर उम्मीद सींची।
सपनों की बुनाई वो चुपचाप करता,
ग़मछा पोंछता पसीना, पर न शिकवा करता।
जब स्कूल में गिरा, वो गमछा उठा,
“चल बेटा, तू गिरा नहीं, बस थोड़ा लुढ़का।”
वो शब्द आज भी सीने में जलते हैं,
बाबा के ग़मछे से बंधे हौंसले पलते हैं।
अब जब भी राहें कठिन सी लगतीं,
गमछा पकड़कर हिम्मत सी जगती।
कभी माथे का पसीना, कभी आँखों का आँसू,
हर मोड़ पे बना वो मेरे साथ का जादू।
बचपन से लेकर जवानी की राहों में,
हर मोड़ पर खड़ा था वो विश्वास की बाँहों में।
आज भी जब दुनिया बड़ी लगती है संग्राम-सी,
बाबा का गमछा है — मेरी सबसे बड़ी आराम-सी।
बचपन से लेकर आज तक, गमछा नहीं सिर्फ़ कपड़ा, बाबा की सीख है — मेरी ताक़त का स्तंभ।
फादर्स डे पर यह एहसास और भी गहरा हो जाता है कि हमारे पिता ने हर संघर्ष में हमारा हाथ थामे रखा — कभी शब्दों से, तो कभी अपने गमछे जैसे साये से। उनकी दी हुई यही विरासत हमें हर परिस्थिति में संभलना सिखाती है। आइए, आज उनके इस अमूल्य साथ को दिल से नमन करें।
