काजल की डिबिया: स्वतंत्रता दिवस की प्रेरक कहानी

14 अगस्त 1949 की शाम थी। गाँव में एक अलग-सी हलचल थी। अगले दिन भारत का दूसरा स्वतंत्रता दिवस मनाया जाना था। स्कूल में ध्वजारोहण और सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयारियाँ…

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लाल आम, पीला तरबूज़

किरण भागता-भागता घर आया और अपनी माँ की ओर आश्रय से देखने लगा, जैसे कुछ बताना चाहता हो। "क्या हुआ मेरे राजा बेटे को", पूछती हुई सुनीता आटा लगाने लगी…

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सबसे बड़ी भूख

सुबह की सुहावनी धूप में कीर्ति चाय की चुस्कियाँ ले रही थी। यह समय उसके लिए बहुमूल्य था, वकालत की दौड़-भाग को भूल कुछ क्षण अपने लिए चुरा लिया करती…

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