ज़रूरी नहीं कि हर कहानी शब्दों से शुरू हो। कुछ कहानियाँ एक नज़र, एक ठहराव, और दिल की हल्की सी हलचल से जन्म लेती हैं। यह कहानी भी वैसी ही है, जहाँ ख़ामोशी ने बात की, दूरी ने क़रीबी सिखाई, और बिना कहे ही एक एहसास हमेशा के लिए रह गया।
बिन कहे
वो रोज़ उसी समय खिड़की के पास आकर बैठती थी।
हाथ में किताब होती, पर आँखें पन्नों पर कम और बाहर आसमान पर ज़्यादा रहतीं।
नीला अम्बर उसे सुकून देता था, शायद इसलिए क्योंकि उसके दिल में बहुत कुछ था,
जो कभी शब्दों में ढल नहीं पाया।
सामने वाली बालकनी में वो भी अक्सर दिखाई देता था।
चाय का कप, हल्की सी मुस्कान, और एक नज़र जो
हर बार उससे पूछती थी, “आज कैसी हो?”
लेकिन यह सवाल कभी हवा से आगे नहीं बढ़ा।
दोनों ने कभी बात नहीं की।
न नाम पूछा, न आवाज़ सुनी।
फिर भी एक रिश्ता था,
आँखों का, इंतज़ार का, और उस पल का
जब दोनों एक साथ बाहर देखते थे।
बारिश के दिन कुछ खास होते।
वो छत पर गिरती बूँदों को देखती,
और वो अपनी बालकनी से हाथ बढ़ाकर
मानो उन्हीं बूँदों में उसका जवाब ढूँढता।
कभी-कभी उसकी किताब बंद रहती,
और वो जान लेता, आज उसका मन परेशान है।
समय बदला।
एक दिन खिड़की बंद रही।
दूसरे दिन भी।
फिर कई दिन।
उसने इंतज़ार किया,
चाय ठंडी होती रही,
और मुस्कान अधूरी।
कई महीनों बाद
एक दिन उसी खिड़की में एक छोटा सा पौधा दिखा।
हरी पत्तियाँ, नई कोपलें।
उसके साथ एक काग़ज़ भी था,
बस दो पंक्तियाँ:
“कुछ कहानियाँ
शब्दों की मोहताज नहीं होतीं।
धन्यवाद,
ख़ामोशी समझने के लिए।”
वो मुस्कुराया।
आँखें नम थीं,
पर दिल शांत।
क्योंकि कुछ प्यार
कहकर नहीं,
महसूस करके पूरे होते हैं।
कुछ प्यार मिलने के लिए नहीं होते,
वो बस हमें बेहतर इंसान बनाने आते हैं।
